दिल्ली में दूसरा 1984 नहीं होने देंगे, हिंसा पर दिल्ली हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी

संशोधित नागरिकता कानून(सीएए) को लेकर उत्तरपूर्वी दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में भड़की हिंसा में शामिल लोगों पर प्राथमिकी दर्ज करने और उन्हें गिरफ्तार करने की मांग करने वाली एक याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय में सुनवाई हुुई। माकपा नेता वृंदा करात की शिकायत के आधार पर अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है या नहीं इस पर अब अदालत दो मार्च को फैसला सुनाएगी। इस दौरान पुलिस आयुक्त का प्रतिनिधित्व करने के मुद्दे पर सॉलिसीटर जनरल और दिल्ली सरकार के अधिवक्ता के बीच तीखी बहस हुई। अदालत में इस मामले पर तीन पांच घंटे के अंदर तीन बार सुनवाई हुई।मामले की सुनवाई दोबारा शुरू हुई तो जस्टिस मुरलीधर ने कहा कि परिस्थिति बहुत ही खराब है। हम सबने वो वीडियो देखे हैं जिसमें कई नेता घृणास्पद भाषण दे रहे हैं। यह सभी न्यूज चैनलों पर देखा गया है।

इसके बाद अदालत ने सभी वकीलों और डीसीपी देव और सॉलिसीटर तुषार मेहता की उपस्थिति में भाजपा नेता कपिल मिश्रा का वो वीडियो चलाया। इसके बाद जस्टिस मुरलीधर ने कहा कि हम पुलिस के रवैये से हैरान हैं। इसके बाद हाईकोर्ट ने एसजी को भी निर्देश दिया कि वो दिल्ली पुलिस कमिश्नर को सलाह दें कि भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करें। मामले की सुनवाई को 2.30 बजे तक के लिए टाल दिया गया है। अदालत ने पुलिस से बुधवार दोपहर 12:30 बजे तक हिंसा को लेकर जवाब देने को कहा था। न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर और न्यायमूर्ति तलवंत सिंह की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि तथ्यों से वाकिफ वरिष्ठ स्तर का एक पुलिस अधिकारी 12:30 बजे तक उनके समक्ष पेश हो।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि पुलिस को हिंसा के मामलों में अदालत के निर्देश की जरूरत नहीं होती है और उसे स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत ने कहा कि यह बेहद जरूरी है। मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोनसाल्व्जि ने न्यायमूर्ति मुरलीधर की पीठ से इस याचिका पर तत्काल सुनवाई की मांग की।